I wrote this poem as my wife is currently out of town and I am suffering with fever/cold in her absence...just to say that I miss her so much...
क्या बताऊँ की कब कब तुम्हारी याद आई
सुबह से शाम तक न जाने कितनी बार आई
सुबह जब दरवाजे पर कामवाली ने घंटी बजायी
याद आई तुम जब मेरी सुहानी नीद की शामत आई
आज सुबह कुछ सूनी सूनी सी लग रही थी
जब की कमरे में मेरी खान्सियों की आवाज गूंज रही थी
मैं क्या जवाब देता जब कामवाली कपड़े धोने के बारे में पूछ रही थी
किचन में जाकर जब चाय बनाने को मैने सोचा
चाय पती का डब्बा न जाने मैने कहाँ कहाँ नहीं खोजा
इस असफलता पर मैंने अपने आप को कितनी बार कोसा
उस वक़्त भी तुम्हारी ही याद आई
ऑफिस जाते वक्त भी न जाने कितनी बार मैने मुड़ कर देखा
बंद दरवाजे से झांकते हुए सिर्फ तुम्हारे चेहरे को ही खोजा
लंच में भी तुम्हारे ही यादों ने ही दौड़ मचाई
जब भूख से मेरे पेट में चूहों ने हुडदंग मचाई
शाम को ऑफिस से आकर एक पल ही जो सकूं से बैठ पाया
जेहन में तुन्हारे यादों के घोड़ों को ही दौड़ लगाते ही पाया
घर के सूनेपन से उकता कर हमने तुम्हारी तस्वीर से ही कर ली दो चार बातें
सोचा काश तुम फोटों फ्रेम से निकल कर सामने आ जाते
तुम्हारे जाने के बाद से ही बुरा हाल हुआ हुआ है हमारा
बुखार और जुकाम से कैसे हो अब जीना गंवारा
नाक से निकले पानी को ही अब तुम अपनी यादों के आंसू समझ लेना हमारा
सोचता हूँ आज की मुझमें तुम्हारे साथ रहने की मुझे में हिम्मत कहाँ से आई
सोचता हूँ आज की मुझमें तुम्हारे साथ रहने की मुझे में हिम्मत कहाँ से आई
तुम जब तक थी तो बीमारी तक भी तुमसे डर कर मेरे पास नहीं आई
डीनर में रोटी का बचा टुकड़ा भी तुमारी याद दिलाता है
जब में उसको कूड़ेदान में फ़ेंक कर चला आता हूँ
खिड़की से जो गुजरता हुआ ठंडी हवा का झोंका जो मुझ से टकराता है
तुम्हारी यादों के समुन्दर में ही मैं अपने आप को ही डूबते हुए पता हूँ
तुम्हारी यादों के परिंदों को उतारने के लिए ये जगह बहुत छोटी है
मैं ही नहीं तुम्हारी याद में लगता है घर की हर एक चीज रोती है
(C) Rakesh Kumar June 2012